आप जीवन में न जाने कितनी ही बार यह प्रण लेते हैं कि जिंदगी के सारे अहम फैसले भावना को इतर रखते हुए करेंगे और दुनियादारी को ही अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएंगे। रिश्ते चाहे कितनी भी नजदीकी लिए हों वहां एक प्रकार की तटस्थता व दूरी बनाए रखेंगे। सारी बातचीत में एक प्रकार की उदासीनता का पुट हो ऐसी आपकी कोशिश होती है।
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एक प्यार करने वाले से पूछा गया कि प्यार क्या होता है? कैसा लगता है? तो उसका जवाब था कि प्यार गेहूं की तरह बंद है, अगर पीस दें तो उजला हो जाएगा, पानी के साथ गूंथ लो तो लचीला हो जाएगा… बस यह लचीलापन ही प्यार है, लचीलापन पूरी तरह समर्पण से आता है, जहां न कोई सीमा है न शर्त। प्यार एक एहसास है, भावना है। प्रेम परंपराएं तोड़ता है। प्यार त्याग व समरसता का नाम है।
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रिश्तों को नए रूप में देखने का समय आ गया है। अब केवल सुंदरता और सज-धज के बल पर रिश्तों में निकटता व गर्माहट नहीं आती है। रिश्तों को प्रगाढ़ करने के लिए रिझाने के अलावा एक-दूसरे को अपनी बुद्धि और वफादारी का सबूत भी देना पड़ता है।
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‘कदम उसी मोड़ पर जमे हैं,
नजर समेटे हुए खड़ा हूं,
जुनूं ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूं,
खुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा।
अगरचे एहसास कह रहा है,
खुले दरीचे के पीछे दो आंखें झांकती हैं,
अभी मेरे इंतजार में वो भी जागती है,
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा,
उसे ये जिद है कि मैं पुकारूं,
मुझे तकाजा है वो बुला ले,
कदम उसी मोड़ पर जमे हैं,
नजर समेटे हुए खड़ा हूं।’ -
जी हां, समझौते तो हर जगह करने पड़ते हैं! फिर प्यार में क्यों नहीं ? मन में बनी आदर्श छवि न मिले तो घुटते क्यों रहें! जो आपके थोड़ा मनमाफिक भी है उसे प्यार से पूरा बना लें!
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