रिश्तों को नए रूप में देखने का समय आ गया है। अब केवल सुंदरता और सज-धज के बल पर रिश्तों में निकटता व गर्माहट नहीं आती है। रिश्तों को प्रगाढ़ करने के लिए रिझाने के अलावा एक-दूसरे को अपनी बुद्धि और वफादारी का सबूत भी देना पड़ता है।
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‘कदम उसी मोड़ पर जमे हैं,
नजर समेटे हुए खड़ा हूं,
जुनूं ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूं,
खुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा।
अगरचे एहसास कह रहा है,
खुले दरीचे के पीछे दो आंखें झांकती हैं,
अभी मेरे इंतजार में वो भी जागती है,
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा,
उसे ये जिद है कि मैं पुकारूं,
मुझे तकाजा है वो बुला ले,
कदम उसी मोड़ पर जमे हैं,
नजर समेटे हुए खड़ा हूं।’ -
कभी मायूस मत होना किसी बीमार के आगे,
भला लाचार क्या होना किसी लाचार के आगे
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सूखी हुई टहनी पर
टंगी
गीली ओंस बूंद की तरह,
टंगी है
मेरी उम्मीद की
थरथराती अश्रु-बूंद
तुम्हारे जवाब के इंतजार में,धवल चांदनी गुजर गई
और ठिठक गई है भोर,
कांप रही है अब भी
मेरी आशा की डोर,आदित्य-रश्मियों से
जगमगा उठी नाजुक ओंस बूंद,
लगा जैसे नाच उठा
लरजत की आस का नीला मोर.. -
तुझसे मिलके चुप हो जाना कैसा होगा






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